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Monday, May 3, 2021

प्यारी बहना!!



प्यारी बहना, आज तुम्हारी विदाई को तीसरा दिन है!!
तुम्हारी विदाई के साथ-साथ, घर की रौनक भी तुम्हारे साथ चली गई!
घर के आँगन में खड़ा पेड़, आज एकदम मायूस शाखाएँ झुकाये खड़ा है......एकदम निश्चल!!
एकदम वीरान....ये कैसा दर्द है....कुस समझ नहीं आ रहा है, बस महसूस कर रहा हूं!!

जिस आँगन में तुमने गुजारा था हसीन बचपन, जहाँ तुम्हारी यादों का एक संदूक है!! आज उस आँगन को छोड़कर जा रही हो!!

कितना मुश्किल होता है एक बेटी होना!!...यादों के सहारे एक नए सिरे से अपना जीवन शुरू करना....एक दर्द, एक टीस..... निःशब्द!!!

विदाई के वक्त तुम्हारे आँसू देखकर, एक पल को मैं अंदर से फुट पड़ा था! मैंने बहुत कोशिश, लेकिन मैं अपने आँसुओं को रोक नहीं पाया! हल्क़ (गले) के नीचे एक दर्द.....जिसे समझा नहीं जा सकता, सिर्फ महसूस किया जा सकता है....असहनीय!!

प्यारी बहना तुम्हारी विदाई के वक्त तुम्हारा पिताजी के गले लगकर रोना....वाकई वो पल मेरे जिंदगी के यादों के संदूक का सबसे मुश्किल पल था!! पिताजी कितने कठोर होने के बावजूद अपने आँसुओं को नहीं रोक पाए!! वो भी मेरी तरह खुलकर आँसू बहाना चाहते थे, लेकिन इस निष्ठुर समाज में हम मर्दों के आँसू निषेध है! समाज क्या कहेगा! मर्द होकर आँसू ! उफ़्फ़ कमाल है!!!......इस निष्ठुर समाज को कोई बताओ कि वो मर्द से पहले इंसान है! जिसमें संवेदना होती है!! वो भी रोना चाहता है!!

खैर पिताजी ने तो अपने आँसुओं को रोक दिया, लेकिन मैं  खुलकर आँसू बहाना चाहता था!! मैं तुम्हारी विदाई के बाद जब अपने आँसुओ को अपने गले में दबाकर घर आया.....घर एकदम वीरानसा प्रतीत हो रहा था, घर के हर एक हिस्से में नज़र आता खालीपन मुझे खाये जा रहा था!


जैसे ही मैंने माँ को देखा, मैं बेतरतीब भागता हुआ। माँ के कंधे पर अपना सिर रखकर रो पड़ा....मैंने बहने दिए अपने आँसुओं को! मैं चाहकर भी नहीं रोक पाया, अपने भीगे हुए नैनो को! उस क्षण घर के हर एक सदस्य की आँखें आँसुओं से भरी पड़ी थी!!

आज सवेरे जब मैंने तुम्हारी सिलाई मशीन की ओर देखा तो वो मुझसे पूछ रही थी कि मेरी मालकिन कब आयेगी!! मैं उसे कुछ जवाब नहीं दे पाया। उससे नजरें बचाकर मैं जैसे ही घर के बाहर आया। तो तुम्हारी स्कूटी मुँह लटकाये, एकदम मायूस खड़ी थी!

 आज सवेरे जब मैं स्नान करके बाहर आया तो मुझे अपने कपड़े ठिकाने पर नहीं मिले! इतनो वर्षो से मुझे सारे कपड़े एकदम सलीके से रखे हुए मिल जाते थे, आदत हो गयी थी!! अब अपनी हर आदत को मुझे बदलना होगा!! 

पिताजी को अब दूसरों के हाथ की चाय नहीं जमती!! शाम को चार बजते ही नींद से उठकर इंतज़ार करता हूं.... तुम्हारे हाथ की चाय का!!

सही मायनों में प्यारी बहना तुम घर का असल बेटा हो!! पिताजी हर काम में तुम्हारी राय जरूर लेते!! घर की सारी जिम्मेदारियों को तुम अपने कंधों पर लेकर चलती हो!

बेटा तो सिर्फ एक परिवार को संभालता है, लेकिन बेटियां दो परिवारों को संभालती है!! आज मोबाइल में पुरानी तस्वीरें देख रहा था! तुम्हारी पुरानी तस्वीरों को देखकर सोचने लगा, वक़्त कितना जल्दी बीत जाता है!! आज तुम  ब्याह दी गयी हो!!! 

प्यारी बहना तुम्हें याद है स्कूल के वो हसीन दिन......जब मैं रोता हुआ या फिर पेटदर्द का बहाना बनाकर तुम्हारे पास आ जाता था!! तुम सही मायनों में मेरे लिए माँ का दूसरा स्वरूप हो! माँ जब ननिहाल जाती थी तो तुम्हारी पायलों की आवाज मुझे माँ का आभास करवाती थी!!

ये (विदाई) तो संसार का नियम है, जिसे सहर्ष हमें स्वीकार करना होगा!! और मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूं कि आपका वैवाहिक जीवन ख़ुशी से गुज़रे! आप इसी तरह उस (ससुराल) घर को भी खुशियों से भर दो!!! भगवान सारी खुशियाँ आपके झोली में डाल दे!!

आपका हितेश!!!

✍️© हितेश राजपुरोहित "मूडी"


Wednesday, April 21, 2021

वो रौनक फिर से लौटेंगी!



                     वो रौनक फिर से लौटेंगी!

सड़कें वीरान है, पार्क सुनसान है.......मुल्क की सारी ज़हीन आवाम अपने-अपने आशियानों में कैद है!
शहर की वो गलियां और बाजार जो आम दिनों में इंसानी चहलपहल से भरे पड़े थे, आज एक नीरव घाटी के समान दिख रहे हैं!

आम दिनों में कल-कारखानों और फैक्टरियों की चिमनियों से उगलता धुँआ रूपी ज़हर अब थम चुका है। सियासती सवाल और मजहबी बवाल थम चुके है

इन दिनों संध्या के समय जब मैं छत के मुंडेरे से झांकता हूं। तो मुझे इस मुल्क की वो पुरानी रौनक याद आती है, जिसके हम आदि हो चुके है.....…......!!!!

आख़िर एक दिन आयेगा जब.......................

जब फिर से यह बाजार, सड़के और पार्क इंसानी वजूद से लबरेज़ हो जायेंगे!
चिमनियां फिर से उसी गति से ज़हर उगलेगी, फिर से मजहबी बवाल और सियासती सवालों का दौर शुरू होगा!

फिर से एक नया शाहीन बाग आबाद कर दिया जायेगा.......जो फिर से दिलवालों के शहर को ख़ूनी आँसू रुलायेगा, फिर से जुल्म का जखीरा खड़ा कर दिया जायेगा!

फिर से मुल्क की ज़हीन बेटियों की आबरु से कोई भेड़िया खेलेगा और हम सभी मूक-बधिर हो कर तमाशा देखते रहेंगे......और न्याय की चौखट पर वह मासूम बेटी गुहार लगाती-लगाती अपने प्राण त्याग देगी, लेकिन यह न्याय के दूत न्याय के बदले देंगे तो सिर्फ़ तारीख़ पर तारीख़!!

फिर से मुल्क की मिल्कियत को सरेआम बेच दिया जायेगा बाजारों में, फिर से सरकारी दफ्तरों में लंबी कतार लगेगी और बाबू अपनी जेब मोटी करेंगे!!

फिर से अख़बारों की स्याही ख़ूनी सुर्खियों को उजागर करेंगी, इतना ही नहीं फिर से गंगा-जमुनी तहज़ीब का ढकोसला तैयार कर दिया जायेगा!

अंधी इस्लामपरस्ती में कुछ लोग फिर से हाथों में खंजर लेकर एक नई सेक्युलर इबारत लिखेंगे और कुछ अदीब तथा तथाकथिक बुद्धिजीवियों की ज़ाहिल ज़मात उनके पक्ष में रंडी रोना रोयेंगे........!!
फिर से पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगा दिए जाएंगे.......!

ग़मगीन मत हो मेरे मुल्क के बाशिंदों...............

यह हमारे मुल्क की खूबसूरती है, जो मुग़लिया सल्तनत से निरंतर गंगा जमुनी तहज़ीब के रूप में चली आ रही है.......तो लीजिये आनंद और दीजिये दुहाई धर्मनिरपेक्षता की............!!!


✍️©हितेश राजपुरोहित "मुड़ी"


Wednesday, February 17, 2021

क़िरदार

दोस्तों वैसे तो दुनियां में करोड़ो क़िरदार है, लेकिन कुछ किरदार ऐसे होतो है जो दिल मे बस जाते है। इन किरदार से जीवन के किसी भी पढ़ाव पर अनायास मुलाकात हो जाती है और यह मुलाकात ताउम्र ह्रदय में सुखद स्मृति के तौर पर बनी रहती है!


कालांतर में साहित्यिक विद्वानों ने किरदारों को अपनी कल्पनाशीलता के आधार पर गढ़ाना शुरू कर दिया और वर्तमान के इस दौर में रंगमंच (सिनेमा) वाले भी हर फ़िल्म के आगे लिख देते है कि फ़िल्म के सभी पात्र और क़िरदार काल्पनिक है और वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है।


दुनियां का सबसे बड़ा झूठ और कॉन्सपिरेसी थ्योरी इन्हीं लेखकों और सिनेमा वालों ने गढ़ी! क़िरदार कभी भी काल्पनिक संभव नहीं है। आप अपनी कल्पनाशीलता को भले ही शिखर तक ले जाओ, आपके द्वारा गढ़ा हर एक क़िरदार इस भूमि पर मौजूद होगा। आपके द्वारा गढ़ा हर-एक काल्पनिक क़िरदार यथार्थ में मौजूद किरदारों को मध्यनज़र रखते हुए बनाया गया है, सही मायनों में यह क़िरदार आपको यहाँ भूमि पर नज़र आ ही जायेगा!!


खैर छोड़िए ! कछु ज्यादा ही हो गया!


क़िरदार के इस आलोचना में गहरा न जाते हुए हम असल मुद्दे पर आते है!!

हर इंसान स्वभाव से घुम्मकड़ होता है। वह जीवन भर घूमता रहता है। कभी पेट की आग के लिए, तो कभी अपनो की तलाश में, तो कभी ख़ुद में ही मौजूद अपने ही क़िरदार से बतियाने दूर कहीं बहुत सुदूर एकांत में घूमने चला जाता है। इस यात्रा में उसे हजारों क़िरदार मिलते है और ये क़िरदार भी जीवन रूपी रंगमंच पर निरंतर यात्रा करते रहे है, घूमते रहते है।

"ये सभी क़िरदार जीवन रूपी यात्रा में घास-फूस रूपी जमीन पर रोल करते रहते है, रोल बनाते रहते है और रोल जलाते रहते है!" यहीं है इस संसार का वास्तविक सत्य।

उपर्युक्त पंक्तियों को युवा पीढ़ी अच्छे से समझ पाएगी क्योंकि इनके जीवन मे रोल भरे पड़े है और रोल बनाने में तो क्या ही कहने.....परफ़ेक्ट gogo!!

मैं ख़ुद बहुत बड़ा घुम्मकड़ हूँ। साल में दो यात्रा वो भी अकेले करना मेरी फ़ितरत है। इन्हीं यात्राओं में मुझे कहीं ऐसे क़िरदार मिले जिन्हें मरते दम तक याद रखूँगा! ऐसे ही एक क़िरदार से आज आपको मिलवाने वाला हूं, तो देर किस बात की मिलते है अपने शशिर पांडे से!!

शशिर पांडे इलाहाबाद के रहने वाले है और स्नातक भी इलाहाबाद विश्विद्यालय से किया है। इनके टोन और ज़बान में इलाहाबादी गौरव कूट कूट कर भरा हुआ है। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी ने इस देश को नजाने कितने ही बेहतरीन लेखक, राजनेता और अभिनेता दिए है, जिनकी फेहरिस्त बहुत बड़ी है। इस कारण शशिर पांडे को अपने  इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पासआउट होने का गुरुर था।

कद में मझोले, हल्के गेहुआँ रंग और शुद्ध स्वदेशी खादी ग्रामोद्योग के  कपड़े से निर्मित कुर्ता-पायजामा पहने पहली बार शशिर मोहदय मुझे मिले थे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्विद्यालय के बग़ल में नवाज़ भाई के पान गल्ले पर! मुँह में पान दबाए जोर जोर से देश के वामपंथियों को गरिया रहे थे। पान के सुर्ख़ थूक उनके अधरों को रंग चुके थे और गरियाते हुए बीच में हल्का सा ब्रेक लेकर एक एक-दो पीक बग़ल में रखे पीकदान में थूक देते.....पहली नज़र में इस क़िरदार ने मुझे क़ायल कर दिया !!


धीरे-धीरे शशिर मोहदय से मेरी मुलाकात होती रही और दोनों साहित्यि के शौकीन होने के कारण अच्छे मित्र बन गए। थोड़े समय बाद पता चला कि शशिर मोहदय अपने ज़माने में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के दबंग छात्रनेता रह चुके और विश्विद्यालय के चुनावों में कट्टे से फायरिंग के मामले में जेल भी जा चुके है....ये इलाहाबाद यूनिवर्सिटी और जेल जाना तो शशिर मोहदय दिन में बीसियों बार बोल देते थे।


एक दिन हमारी टोली विश्विद्यालय के कैंटीन में बैठी थी। सब मित्र एक दूसरे से बतिया रहे थे। चाय और सिगरेट के साथ देश-विदेश के मुद्दों पर गहन चिंतन हो रहा था, लेकिन इन सब के परे शशिर मोहदय फ़ोन पर लगे हुए थे।

जोर जोर से बोल रहे थे कि "मुन्ना सिंह अपने एकदम ख़ास और अज़ीज है। उनके एक इशारे पर साला हम इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में विपक्षी मधुसूदन त्रिपाठी के खेमे पर खुद पड़े थे कट्टा लेकर! पूरे यूनिवर्सिटी में धुँआ धुँआ कर दिए थे बे! आजकल मुन्ना सिंह अपने उत्तरप्रदेश में कॉंग्रेस का सारा मीडिया का काम देखते है!!"

"कट्टर हिन्दू संगठन इस देश को बर्बाद कर दिए है!"

अचानक से आई इस तेज आवाज़ ने मेरा और शशिर मोहदय का ध्यान भटका दिया। यह आवाज़ कैंटीन में मौजूद वामपंथी ख़ेमे से मुख़र्जी की थी!

इस आवाज़ को सुनते ही शिशर मोहदय ने न आव देखा न ताव सीधा फ़ोन ऱखकर दौड़ पड़े वामपंथी ख़ेमे पर प्रहार करने। हाथापाई हुई, एक दूसरे के कॉलर पकड़े गए!

जैसे तैसे करके शशिर मोहदय को हम खींचकर दूर ले आये, लेकिन इलाहाबाद के दबंग छात्रनेता ऐसे थोड़े ही रुकने वाले थे! मोहदय क्रोध से कापते हुए जोर से बोलने लगे " इस वामपंथी को समझाओ बे! इसको तनिक मालूम नहीं है की साल हम इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के दबंग छात्रनेता है!!

थोड़ा रुके और फिर बोलना शुरू किया " मधुसूदन त्रिपाठी ख़ेमे पर कट्टा चलाकर साला हम जेल गए थे, इसको बताओ रे की हमसे न भिड़े! नहीं तो साला कट्टे से यहीं ठोक देंगे और साला इलाहाबाद हाई कोर्ट में जाकर सरेंडर करेंगे, सुना बे इलाहाबाद हाई कोर्ट में सरेंडर करेंगे!!

यह सब सुनकर वामपंथियों के गले में आ गई। वामपंथी ख़ेमा थोड़े ही समय में आंखों से ओझल हो गया!!


शशिर पांडे के क़िस्से तो भरे पड़े है। कभी फ़ुर्सत से आपको सुनायेंगे ...!!


से सभी क़िरदार आपको जीवन भर याद रहते है, क़िरदार कभी भी काल्पनिक नहीं हो सकता! कल्पना का सहारा लेकर हम असल क़िरदार और यथार्थ को ठुकरा नहीं सकते!!


खैर जीवन के इस सत्य में अभी मेरा दूसरा रोल तैयार हो गया है, तो हम चले उस रोल को खत्म करने!

जय महादेव , हर हर महादेव!!

✍️©हितेश राजपुरोहित "मुड़ी"






Friday, October 16, 2020

जालोर के राधे भैया!

ये है हमारे शहर के राधे भैया, दिखने में एकदम मासूम और व्यवहार के क्या ही कहने......पूरे शहर के अजीज और सब के दिलों से जुड़े ....राधे भैया रूप नगर वाले!!

राधे भैया मात्र एक काल्पनिक किरदार है, जिसको आप किसी में भी खोज़ सकते हो.....ये किरदार आप में भी हो सकता है या फिर मेरे अंदर भी हो सकता है!

तो चलिए जानते है राधे भैया की निजी जिंदगी के अफ़साने! ज़रा दिल थामके बैठिएगा........।

राधे भैया का बचपन बाकी दूसरे बच्चों की तरह ही सामान्य बीता, बस खास था उनका क्रिकेट के प्रति बेशुमार इश्क़.....जो आजतक अनवरत जारी है!

विद्यालय में थोड़े बदमाश, लेकिन सबके चहते .....सभी के साथ दोस्ती....हर किसी के साथ कनेक्शन जोड़ देते थे दिल से......साला सामने वाला शख़्स पंद्रह दिन में कलेजे के घाव दिखा दे, ऐसे थे राधे भैया!

उम्र के पहिये ने करवट बदली, राधे भैया थोड़े जवान हुए। आशिक़ी के चक्कर उनके बस की बात नहीं थी, लेकिन एनोजय पूरे करते थे जीवन के, बस दिल्लगी दूर तलक तक नहीं रखते थे अपने जीवन में!

जाने कितनी ही कन्याओं के चहते थे राधे भैया......पूरे कलाकार आदमी थे। कविताओं के शौकीनों के साथ मिर्ज़ा ग़ालिब बन जाते थे, तो डांसर के साथ जैक्सन और पढ़ाकू बिरदारी के साथ एकदम अलग ही रौब....शहर के बच्चों से लगाकर बड़ो तक, सब सम्मना करते थे राधे भैया का।


अब राधे भैया ट्रैक से भटक गए है, लेकिन आज भी छवि और सिद्धान्त नहीं बदले अपने जीवन के, लोगों के लिए राधे भैया आज भी वैसे ही है, लेकिन खुद राधे भैया अपने नज़रों में गिर चुके है!
कल ही उनको अपने साथ शिवशंकर होटल के ऊपर सिगरेट पिलाने ले गया। मैं जैसे ही काउंटर पर सिगरेट मांगने लगा, वैसे ही दुकानदार ने दूर खड़े राधे भैया की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि ये तो वही राधे है ना.......जिसने लगातार आठ बार राज्य स्तरीय विज्ञान मेले में प्रथम स्थान हासिल किया था......बहुत ही होशियार है, वैसे करता क्या है इन दिनों.......!!

दुकानदार के ऐसा बोलते ही मैं एक गहरी सोच में मशगूल हो गया, ये राधे भैया भी कमाल है.....खुद अपने नजरों में बर्बाद हो चुके है, लेकिन पूरे शहर को कितना गर्व है इन पर!

ओ साहब कहां खो गए (दुकानदार सिगरेट देते हुए बोला) 

मैंने अपने अवचेतन दिमाग को आराम देते हुए बोला, आजकल नेशनल ड्रामा स्कूल पुणे से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे है।
इतना कहते ही मैं वहां से सीधे राधे भैया के पास चला आया। 

आप भी सोच रहे होंगे कि ई साला राधे ऐसा क्या कांड कर दिया की अपने नजरों में गिर गए!

राधे भैया होली वाले दिन भांग के नशे में हमको सब बता दिए थे....चलो आप भी सुन लो राधे भैया का ट्रैक से भटकना!

बात स्कूल ज़माने की है, क्लास की सबसे होशियार और सीधी छोरी उनको पसंद करती थी, लेकिन ये बात साला राधे कभी समझ नहीं पाया.......जो सबके तरह उसे भी अपना दोस्त मानता था। राधे ने स्कूल छोड़ दी और किसी गुरुकल में एडमिशन ले लिया, लेकिन स्कूल के सारे बंदों और बंदियों के संपर्क में बना रहा,सिर्फ उस लड़की को छोड़ के!
फ़िर कॉलेज टाइम में हुआ यूँ की सभी जवान लौंडो की तरह राधे भैया भी गर्ल्स कॉलेज के चक्कर काटने लगे। एक दिन वही क्लास की सबसे होशियार बंदी मिली राधे भैया को..... नॉर्मल बातचीत हुई, हालचाल जाने एक दूसरे के!

जाते वक्त उस लड़की ने राधे के नंबर मांग लिए और बोला कि मैंने रवीना से तेरे नंबर कितनी ही बार मांगे, लेकिन उसने नहीं दिए..........ये रवीना ही एकमात्र शख़्स थी जो ये जानती थी कि वो ( होशियार लकड़ी) राधे को पसंद करती थी। पर कहानी में थोड़ा ट्वीस्ट था, रवीना भी राधे भैया पर लट्टू थी..... अपने राधे भैया थे ही ऐसे!

धीरे धीरे फ़ोन पर बात बाते शुरू हुई, लेकिन राधे उसके प्यार को पकड़ नहीं पाए, बस दिल के मामलों में थोड़ा कमज़ोर थे राधे भैया.......जैसे तैसे हिम्मत कर लड़की ने अपने बोल दिया अपने दिल का हाल राधे भैया को!

राधे का क्या.....उसके लिए प्यार और इश्क़ दोनों किस कबूतरों के नाम है?

राधे दिलों के मायने नहीं समझ पाया, उसके लिए सिर्फ जिस्म मायने रखता था! उसने उस लड़की के साथ बहुत घटिया सलूक किया!

मुझे आज भी याद है होली का वो दिन.......राधे भांग के नशे में अपने भीगें नैनो से बोल रहा था कि सुन हितेश........राधे ने अपने लाइफ में एक ही गलत काम यानी पाप किया है, वो है उस लड़की की लाइफ से खेलना!

साला वो मुझे सच्चे दिल से प्यार करती थी और मैं कम्बख़्त उसके जिस्म का उपभोग करता चला गया.....वो मेरी ख़ुशी के लिए हॉस्टल से भाग कर मनाली चली आई........हिचकिचाते हुई भीगी आँखों से बोले.......हितेश! मैंने एक परफ़ेक्ट लाइफ पार्टनर को खो दिया, मुझे मालूम था कि उसकी जैसी मुझे इस जन्म में नहीं मिलने वाली.....फिर भी मैं साला उसके जिस्म और जज्बात के साथ खेलता रहा!

धिक्कार है! मेरे जीवन पर, थू है मेरे ऊपर!.........तुम मानो न मानो, लेकिन मैं उन्हीं पापों की सजा काट रहा हूँ, और ताउम्र काटूँगा.........मैंने एक नेकदिल इंसान का जीवन बर्बाद किया है।

आँखों से आँसुओं की झड़ी लगी हुई थी.....राधे भैया थोड़े रुके और फिर बोलना शुरू हुए!!

लास्ट तीन साल पहले मिल था, सबकुछ खत्म होने के बाद फिर भी .....उसने हँसते हुए बोला था कि शायद मैं ही गलत थी........तुम सही थे यार....तुम भी राधे छोड़ो उस बात को.....बताओ नई दोस्त बनाई की नहीं!!

उसी दिन से राधे अपने नज़रों में गिर गया और नशे में अपने सपनों को अपनी आँखों के सामने रोज़ मरते हुए देख रहा है, पिछले सात साल से!!

आप सभी से निवेदन है कि राधे जरूर बने, लेकिन राधे के जीवन से सीख लेते हुए......किसी नेकदिल इंसान के जिस्म और जज्बातों से मत खेलना!!

✍️©हितेश राजपुरोहित "मुडी"
 

Sunday, August 2, 2020

प्यारी बहिना

 दोस्तो, रक्षा बंधन का त्योहार आ गया है!
इस दिन हम एक अच्छी-सी फ़ोटो खींच के लगा देंगे स्टेटस पर, प्यारी बहना हैप्पी रक्षा बंधन! 

मैं नहीं कहता कि तस्वीर मत लगाओ, लेकिन कभी गहराई से महसूस किया है इस बहिन के रिश्ते को, इस रिश्ते के एहसासों को, इस रिश्ते की बचपन वाली यादों को!

इस मोबाईल वाले दिखावटी समय में, भला कौन रिश्तों के बारे में सोचता है!
तो चलो आज मैं ही आप सभी को इस खूबसूरत रिश्ते की पुरानी हसीन यादों में ले चलता हूं।

वो बचपन में गुड्डे-गुड़ियों के खेल में, बहिन के संग घंटों खेलना और अंत में जानवरों की तरह एक दूसरे से झगड़ना, बाल खींचना..... और रुठ के माँ पास चला जाना और थोड़ी देर बाद वापिस उसके साथ खेलना........तुम भूल सकते हो, लेकिन मैं आज तक नहीं भूला!!
स्कूल में पेट दर्द हो या पिटाई, मैं भागकर तेरी क्लास में ही तो आता था। तुम मुझे अपने पास बिठाकर, मेरी आँसुओं से भरी आँखों को साफ करती थी। सच कहूँ तो तुझमें उस वक्त मुझे माँ नज़र आती थी!
तुम ये सभ भूल सकते हो, लेकिन मैं आज भी नहीं भूला!!

दीपावली की छुटियों में होमवर्क पूरा नहीं करना और अंतिम दिन पर जोर-जोर से रोना और बोलना की कल स्कूल नहीं जाऊँगा.....मैडम मारेगी.....बहिन द्वारा मेरा भी होमवर्क करना ....वो भी पापा के नजरों से बचकर....... मैं नहीं भूल सकता प्यारी बहिना!

माँ जब भी ननिहाल जाती थी। तो बहिना के पायल की आवाज, मुझे माँ के घर पर होने का एहसास करवाती थी.....!
माँ के घर नहीं होने पर, माँ का रूप धारण कर लेती है....बहिना।
सुबह जल्दी उठकर झाड़ू लगाना, मटके में पानी भरना, कपड़े धोना, मेरा और खुद का टिफ़िन बनाना......... आसान नहीं होता है माँ दूसरा स्वरूप बनना......प्यारी बहिना!

थोड़ी बड़ी होते ही घर में माँ की जगह ले लेती है ,बहिना।
खुद के खाने की प्लेट से निवाला रख देती है, मेरे लिए बहिना!
इसीलिए ही तो माँ का दूसरा स्वरूप होती है ......बहिना।

जिम्मेदारियां घर की सारी, स्वयं उठा लेती है, खुद सहकर सारी परेशानियां, हमारे होठों पर मुस्कान लाती हैं..... प्यारी बहिना।
इससे ज्यादा मेरी हिम्मत नहीं होगी बोलने की.......भीग जाएगी आँखें आँसुओ से........!

✍️©हितेश राजपुरोहित "मुडी"

Thursday, July 16, 2020

वो आख़िरी खत!


        
                     

प्यारे पापा और मम्मी, आप इस दुनिया के सबसे अच्छे माता-पिता हो। इसमें कोई दोराय नहीं है, लेकिन मैं जीवन के इस छोटे से दौर में कभी एक अच्छा बेटा साबित नहीं हो पाया और ना ही आपके अरमानों पर खरा उतर पाया!

मुझे नहीं मालूम कि इस फाँसी के फंदे से जीवन का क्या होगा? लेकिन इतना जरूर मालूम है कि मेरे दर्द की यह लम्बी टीस समाप्त हो जाएगी और उन तमाम सवालों के उत्तर देने नहीं पढ़ेंगे, जो यह समाज मुझसे पूछता है!
आख़िर कब तलक मैं यह भौकाल सहन कर पाता, इंसान हूँ मशीन नहीं! ......मेरे भी कुछ सपने थे, आशाएं थी, संवेदनाएं थी!

वर्तमान में जहाँ देखों वहाँ इस समाज ने एक भौकाल मचा रखा है और कमाल की बात यह है कि अभिभावक इस भौकाल के भार को खुशी खुशी अपने कंधों पर लाद, आगे बढ़ा रहे है!

सारे अभिभावक अपने बच्चों को मशीन मान बैठे है, हाँ मानता हूँ कि यह वर्तमान का दौर प्रतिस्पर्धा का दौर है, लेकिन यह कैसी प्रतिस्पर्धा?

जहाँ उसके बचपन के खुशनुमा हसीन पलों को नजरअंदाज कर, आप उसे ट्यूशन और स्कूल के बोझ तले दबा देते हो! आपको तो बस अपने समाज और पड़ोस में अपने स्टैंडर्ड को ऊँचा रखने के लिए और दूसरे अभिभावकों से होड़ के कारण यह सुनने की चाहत है कि फलाने के बच्चें ने इस बार मैरिट टॉप की, IIT का एग्जाम क्रैक कर दिया, वगैरह वगैरह!!

 कभी बिन मन के मुझसे पूछ लेते की आख़िर मुझे क्या करना था?......मुझे नहीं करना था एग्जाम क्रैक, मुझे नहीं आना था मैरिट में!
जिस भी अभिभावक को देखों अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल और ढेर सारे ट्यूशन पढ़ाने का भूत सवार हो गया है। इंग्लिश का, मैथ्स का, साइंस का.....कभी उस बच्चें से पूछा उसको क्या करना है?

आप इतनी महंगी स्कूलों और ट्यूशनों के जरिये यह तो समझा दोंगे की दो और दो चार होते है, लेकिन यह कब समझा सकोगे की खुश कैसे रहा जाए और जीवन के विकट समय को कैसे जीवटता के साथ जिया जाए!

मुझे यह तो मालूम है कि दो को दो गुणा करने से पर चार होता है, लेकिन मुझे यह नहीं मालूम कि जीवन मे खुश कैसे रहा जाता हैं। क्या आपको मालूम हैं?
अगर है तो वाकई में आप खुशकिस्मत इंसान हैं।

आप सारे अभिभावकों की यही समस्या है कि आप चाहते हो कि मेरा बच्चा समाज के चार लोगों के बीच रौबदार अंग्रेजी बोल पाए, अपना और अपने पिता का स्टैंडर्ड मेंटन रख पाए!......आपने इस कारण उसे चार लोगों के बीच अंग्रेजी तो बोलना सीखा दिया, लेकिन निहायत ही शर्म की बात है कि वो बच्चा समाज के चार लोगों के सामने अपने दादा, पड़-दादा का नाम नहीं बता पाता क्योंकि आपने कभी उसको बताया ही नहीं, आपको तो बस रौबदार अंग्रेजी से मतलब था!

मैं भी पागल हूं,किसको समझा रहा हूं! अगर समझ पाते तो एक बार झूठा ही सही मुझे पूछ तो लेते की आखिर बेटा तुझे क्या करना है?

बस और कुछ नहीं कहना चाहता ......मानता हूँ कि आप हमारे भविष्य को लेकर चिंतित हो, लेकिन चिंता से कुछ भी हल नहीं होने वाला उसके लिए तो इस पूरी पीढ़ी को चिंतन करना होगा........!!

प्यारे अभिभावकों गलती आपकी भी नहीं है, आपने अपने जीवन का सिर्फ़ भयानक चेहरा (बेरोजगारी और नॉकरी) ही देखा है, जरा इससे अपनी नज़रें हटाकर देखों...... जीवन के कई हसीन चेहरे है!

काग़ज़ की मार्कशीट आख़िर कैसे किसी बच्चे का भविष्य तय कर सकती है?........अंकों के इस भंयकर जाल में हम बच्चें तिल-तिल के मर रहे है!

सारे अभिभावकों से मेरा बस इतना ही कहना कि है अपने बच्चों को रौबदार अंग्रेज़ी के साथ-साथ तहज़ीब और संस्कार भी सिखाए........ आख़िर किसी को तो इन संस्कारों को आगे की पीढ़ी को वसीयत के रूप में देना होगा.....इस बोझ को अपने कंधों पर लेना होगा!

माँ को मेरा प्रणाम कहना और............



 हां, अगर हो सके तो मेरे जैसे हज़ारों बच्चों को इस फाँसी के फंदे से बचाने का चिंतन जरूर करें, चिंता मत करना.....चिंता किसी भी समस्या का हल नहीं है!!
 
हो सके तो मुझे माफ़ कर देना......आपका प्रिय बेटा!


नोट:- नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर घंटे एक छात्र आत्महत्या करता है, जिसमें हर दिन लगभग 28 आत्महत्याएं होती हैं। NCRB के आंकड़ों से पता चलता है कि 2018 में 10,159 छात्रों की आत्महत्या हुई, 2017 में 9,905 और 2016 में 9,478 छात्रों की वृद्धि हुई।

✍️© हितेश राजपुरोहित "मूडी"


Wednesday, July 1, 2020

दुःख


बारिश अभी रुकी है, ठंडी बयार मेरे चित को आहिस्ता आहिस्ता अपने आगोश में ले रही है, आसमान में काले मेघ अभी तक अपना विराट स्वरूप लिए मुस्तैद है!

थोड़ा समय बीत जाने के बाद ये बंजर पड़ी भूमि भी हरी चुनर ओढ़ लेंगी और चारों तरफ खुशनुमा मौसम होगा!

लेकिन! मेरे अंतस्थ का माहौल दुःखों से भरा पड़ा है!
अनगिनत दुःखों का ये जाल हलक के नीचे दबा पड़ा है.....जिसे चाहकर भी मैं कभी, किसी से बया नहीं कर पाता हूँ!

जब इन दुखों के बारे में गहन चिंतन करता हूं, तो ऐसा लगता है मानों मेरे हलक के नीचे एक दर्द की टीस उभर आती है, सिर्फ आँखों से आँसू नहीं निकलते!

मैं हर पल मर-मर के जीवन जिये जा रहा हूं, नजाने इन दुःखों से कब निज़ात पाऊँगा.... इक उम्मीद के सहारे आसमां को ताकते, मैं सोच ही रहा था कि काले मेघों ने तेज गर्जन के साथ प्रचंड रूप धारण कर, तेज बौछार प्रारम्भ कर दी!
मैं सुनसान सड़क से बेतरतीब भागता और हांफता हुआ घर की तरफ़ दौड़े जा रहा हूँ..... इसी बीच ख़याल आया कि जिंदगी भर इंसान ऐसे ही अपने घर (मौत) की तरफ़ बेतरतीब भागते जाता है और अंततोगत्वा चला जाता है.....इस दुनियावी बवालों से दूर, बहुत दूर.......अपने घर!😢

✍️©हितेश राजपुरोहित "मूडी"

कुछ मुलाक़ातें वक़्त से आगे निकल जाती हैं

कुछ लोग ज़िंदगी में यूँ ही नहीं मिला करते,   वे अनजाने में यादों का हिस्सा बन जाया करते हैं। चौदह अगस्त से शुरू हुआ था बातचीत का...